आरक्षण सुधार आंदोलन से सियासी हलचल, महिला आरक्षण पर बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने

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देश में आरक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर दिल्ली, लखनऊ, पटना और जयपुर जैसे कई शहरों तक जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग उठ रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे आरक्षण समाप्त करने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि इसकी समीक्षा हो और इसका वास्तविक लाभ जरूरतमंद एवं वंचित वर्गों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे।

आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग

केंद्रीय दिल्ली में रविवार को बड़ी संख्या में लोग आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर जुटे। प्रदर्शनकारियों ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अधिक अवसर, आरक्षण के लाभों की समीक्षा, क्रीमी लेयर जैसे प्रावधानों पर चर्चा और उन समुदायों तक लाभ पहुंचाने की मांग उठाई, जो अब तक अपेक्षाकृत कम लाभान्वित हुए हैं। आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों ने ‘कोटा विदिन कोटा’ और एक परिवार को सीमित अवसर जैसी व्यवस्थाओं पर भी विचार करने की मांग रखी है।

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने क्या कहा?

इस आंदोलन ने राजनीतिक दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने स्पष्ट कहा है कि आरक्षण किसी की खैरात नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकार है और इसे कमजोर नहीं होने दिया जाएगा। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने भी आरक्षण के विरोध में उठ रही आवाजों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर भाजपा सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने ‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने की आशंका जताई है। बसपा प्रमुख मायावती ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई मांगों पर सवाल उठाते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले संवैधानिक अधिकारों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ का विरोध किया है। वहीं प्रकाश आंबेडकर और चंद्रशेखर आजाद ने भी आरक्षण के मुद्दे पर अपनी अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं दी हैं।

UP उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात की

आरक्षण पर चल रही बहस के बीच उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलन से जुड़े कुछ छात्र प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उनकी मांगों को गंभीरता से सुनने की बात कही। उन्होंने कहा कि छात्रों की मांग है कि देश के प्रत्येक युवा को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें और इस विषय पर संबंधित स्तर पर बातचीत कराई जाएगी।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि जब तक समाज में सामाजिक असमानता बनी हुई है, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। उनका कहना है कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समाज की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर देखा जाना चाहिए।

भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव

इसी बीच महिला आरक्षण को लेकर भी भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने कांग्रेस नेतृत्व से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए बनाए गए कानून के समर्थन में आगे आने की अपील की है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया है।

दूसरी ओर कांग्रेस का तर्क है कि महिला आरक्षण कानून को जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़े जाने के कारण इसके लागू होने में देरी हो रही है। कांग्रेस का सवाल है कि जब संसद के दोनों सदनों से कानून पारित हो चुका है और उसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है, तो इसे लागू करने की प्रक्रिया को तेज क्यों नहीं किया जा रहा है।

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कुल मिलाकर, आरक्षण सुधार की मांग और महिला आरक्षण के मुद्दे ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखने की चिंता है, तो दूसरी ओर व्यवस्था के लाभ को वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचाने और समान अवसर सुनिश्चित करने की मांग उठ रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा सरकार, विपक्ष और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच बड़े राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रह सकता है।

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