जब मेला सुरक्षित नहीं रहा: सार्वजनिक सुरक्षा पर हमारी सामूहिक चुप्पी
सूरजकुंड मेले का झूला हादसा एक दुर्घटना नहीं था। यह एक चेतावनी थी, जिसे हमने पहले भी कई बार अनसुना किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कीमत एक पुलिस अधिकारी ने अपनी जान देकर चुकाई।
हर बार ऐसे हादसों के बाद हम एक तयशुदा चक्र में फंस जाते हैं। शोक संदेश आते हैं। जांच के आदेश दिए जाते हैं। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगले मेले तक। अगले हादसे तक।
सवाल यह नहीं है कि झूला क्यों गिरा।
सवाल यह है कि हम गिरते झूलों को सामान्य क्यों मान चुके हैं।
भारत में सार्वजनिक आयोजनों को लेकर एक खतरनाक मानसिकता विकसित हो गई है। हम सुरक्षा को “बाद में देखने वाली चीज़” मानते हैं। जब तक सब ठीक चलता है, तब तक नियम बोझ लगते हैं। और जब कुछ गलत होता है, तब हम दोष एक ऑपरेटर, एक कर्मचारी या एक मशीन पर डालकर आगे बढ़ जाते हैं।
लेकिन सच यह है कि यह सिस्टम की विफलता है।
एक ऐसी व्यवस्था की विफलता, जहां सुरक्षा प्रमाणपत्र औपचारिकता हैं और निरीक्षण एक टिक-मार्क अभ्यास।
सूरजकुंड में मरा पुलिस इंस्पेक्टर किसी निजी लापरवाही का शिकार नहीं हुआ। वह एक असुरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था का शिकार हुआ।
अगर इस हादसे के बाद भी सार्वजनिक सुरक्षा सिर्फ भाषणों और प्रेस नोट्स तक सीमित रही, तो अगली बार सवाल “क्यों” का नहीं होगा।
सवाल होगा — किसकी बारी थी।
पब्लिक सेफ्टी फेल्योर
झूले गिरते क्यों हैं और सिस्टम उन्हें गिरने से क्यों नहीं रोक पाता
पब्लिक सेफ्टी फेल्योर क्या होता है?
जब किसी सार्वजनिक स्थान पर जोखिम पहले से मौजूद हो, चेतावनी के संकेत दिखें, नियम लिखित रूप में हों — फिर भी हादसा हो जाए — तो उसे सार्वजनिक सुरक्षा की विफलता कहा जाता है।
सूरजकुंड का मामला इसी परिभाषा में आता है।
कहां-कहां चूक होती है
1. अस्थायी संरचनाओं की ढील
मेले और उत्सवों में लगने वाले झूले स्थायी नहीं होते। इन्हें जल्दी लगाया जाता है, जल्दी हटाया जाता है। इसी जल्दबाज़ी में तकनीकी जांच अक्सर अधूरी रह जाती है।
2. निरीक्षण का दिखावा
अधिकांश मामलों में निरीक्षण कागज़ों तक सीमित होता है। झूला चलने की अनुमति मिल जाती है, लेकिन वास्तविक भार परीक्षण और स्ट्रेस टेस्ट नहीं होते।
3. जवाबदेही का अभाव
अगर हादसा हो जाए, तो जिम्मेदारी नीचे की ओर धकेल दी जाती है। ऑपरेटर, ठेकेदार या कर्मचारी। लेकिन अनुमति देने वाली एजेंसियां सवालों से बच निकलती हैं।
4. आपातकालीन तैयारी की कमी
भीड़ नियंत्रण, मेडिकल सहायता और बचाव अभ्यास अक्सर नाममात्र के होते हैं। हादसे के बाद प्रतिक्रिया हमेशा देर से आती है।
यह क्यों खतरनाक है
क्योंकि यह विफलता सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती।
यह धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों, स्टेज शो और सार्वजनिक सभाओं तक फैलती है।
जब सुरक्षा एक औपचारिकता बन जाए, तो हादसा सिर्फ समय का सवाल रह जाता है।
हादसों का पैटर्न: भारत में सार्वजनिक आयोजनों में सुरक्षा क्यों फेल हो रही है
पिछले कुछ वर्षों में भारत में सार्वजनिक आयोजनों से जुड़े हादसों का एक स्पष्ट पैटर्न उभरकर सामने आता है।
क्या बताता है ट्रेंड एनालिसिस
• अधिकांश हादसे अस्थायी संरचनाओं से जुड़े होते हैं
• ज़्यादातर घटनाएं शाम के समय, जब भीड़ चरम पर होती है, घटती हैं
• कई मामलों में पहले से चेतावनी संकेत मौजूद होते हैं
• जांच रिपोर्टों में बार-बार मेंटेनेंस और निरीक्षण की कमी सामने आती है
यह संयोग नहीं है। यह एक सिस्टमेटिक समस्या है।
सार्वजनिक आयोजनों का जोखिम प्रोफाइल
| जोखिम | स्थिति |
|---|---|
| भीड़ नियंत्रण | कमजोर |
| तकनीकी निरीक्षण | औपचारिक |
| आपातकालीन प्रतिक्रिया | धीमी |
| जवाबदेही | बंटी हुई |
जब हर स्तर पर “कोई और देख लेगा” की मानसिकता हो, तो नतीजा अक्सर त्रासदी होता है।
सूरजकुंड हादसा डेटा में कहां फिट बैठता है
• अस्थायी झूला
• भारी भीड़
• तेज़ गति वाली राइड
• चेतावनी संकेतों की अनदेखी
• प्रतिक्रिया में देरी
यह केस-स्टडी बन सकता है।
लेकिन सवाल यह है — क्या इसे बनने दिया जाएगा?
डेटा हमें डराने के लिए नहीं है।
डेटा हमें यह समझाने के लिए है कि यह हादसा रोका जा सकता था।
जब अगली बार किसी मेले में झूला घूमे,
तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कितना मज़ा आएगा”
सवाल यह होना चाहिए — कितना सुरक्षित है।