जब निशांत कुमार को बिहार का स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया, तब चर्चा उनके काम से ज्यादा उनकी नियुक्ति को लेकर थी.
वजह भी थी. बिहार की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहने के बावजूद निशांत कुमार कभी फ्रंटलाइन राजनीति में नजर नहीं आए. ऐसे में जब उन्हें स्वास्थ्य जैसा बड़ा और संवेदनशील विभाग मिला, तो सवाल उठने लगे- क्या वो इस जिम्मेदारी को संभाल पाएंगे?
फिर सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो वायरल हुए.
योग दिवस के कार्यक्रम से जुड़े वीडियो हों या फिर शुरुआती दिनों में दिए गए कुछ बयान, विपक्ष को मौका मिल गया. सोशल मीडिया पर मीम्स बनने लगे. आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया कि स्वास्थ्य विभाग की कमान ऐसे व्यक्ति को दे दी गई है, जिसे प्रशासनिक अनुभव कम है.
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी.
अस्पतालों के औचक निरीक्षण और बदली चर्चा
स्वास्थ्य मंत्री बनने के कुछ ही समय बाद निशांत कुमार अचानक सरकारी अस्पतालों में पहुंचने लगे. सबसे ज्यादा चर्चा पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के निरीक्षण की हुई.
निरीक्षण के दौरान डॉक्टरों की गैरहाजिरी, अव्यवस्था और मरीजों से कथित तौर पर अधिक पैसे वसूले जाने जैसी शिकायतें सामने आईं. मौके पर ही अधिकारियों को निर्देश दिए गए. कई मामलों में जवाबदेही तय करने की बात भी कही गई.
यहीं से चर्चा का रुख बदलने लगा.
सोशल मीडिया पर भी बदलने लगी राय
जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ दिन पहले तक निशांत कुमार की आलोचना हो रही थी, वहीं अब उनकी सक्रियता की चर्चा होने लगी.
कई यूजर्स ने लिखा कि बिहार में लंबे समय बाद स्वास्थ्य विभाग में इस तरह की सक्रियता देखने को मिल रही है. कुछ लोगों ने उनकी कार्यशैली की तुलना पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों से भी की. अस्पतालों के औचक निरीक्षण और अधिकारियों के साथ लगातार बैठकों को भी उनकी सक्रियता की मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.
सोशल मीडिया पर कई लोगों का कहना है कि किसी भी मंत्री को उसके शुरुआती बयानों या वायरल क्लिप्स के बजाय उसके काम के आधार पर परखा जाना चाहिए. समर्थकों का तर्क है कि यदि स्वास्थ्य विभाग में जवाबदेही बढ़ती है और अस्पतालों की व्यवस्था में सुधार दिखाई देता है, तो इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा.
हालांकि, हर कोई इस राय से सहमत नहीं है।. आलोचकों का कहना है कि शुरुआती दौर में औचक निरीक्षण और सख्त बयान देना अलग बात है, लेकिन असली चुनौती इन निर्देशों को जमीन पर लागू करने की है.
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी मंत्री का मूल्यांकन लंबी अवधि के कामकाज के आधार पर होना चाहिए. उनके मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार एक सतत प्रक्रिया है और इसके परिणाम सामने आने में समय लगता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता, दवाओं की आपूर्ति, मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार दिखाई देता है, तभी इन प्रयासों को पूरी तरह सफल माना जाएगा.
यानी, निशांत कुमार को लेकर फिलहाल दो तरह की राय देखने को मिल रही है. एक वर्ग उनकी सक्रियता की सराहना कर रहा है, जबकि दूसरा वर्ग ठोस परिणामों का इंतजार करने की बात कह रहा है.
क्या शुरुआती सक्रियता ही काफी है?
आलोचकों का कहना है कि किसी भी मंत्री का आकलन कुछ औचक निरीक्षणों या शुरुआती सक्रियता के आधार पर नहीं किया जा सकता. असली परीक्षा तो आने वाले महीनों में होगी, जब यह देखा जाएगा कि सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था में जमीनी स्तर पर कितना बदलाव आता है.
सवाल अब भी वही है- क्या निशांत कुमार शुरुआती सक्रियता को स्थायी सुधार में बदल पाएंगे?
क्योंकि बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियां छोटी नहीं हैं. और किसी भी स्वास्थ्य मंत्री की असली पहचान सोशल मीडिया नहीं, बल्कि अस्पतालों में दिखने वाले बदलाव से तय होती है.
Author: Akshay Srivastava